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भ्रामरी प्राणयाम करने का तरीका

श्वांस को लम्बा गहरा फफड़ों में भरते हुये, दोनों कानों में अंगुलियां डालकर कानों को बन्द कर देंगे, बाहर की कोई भी ध्वनि सुनाई ना दे। अब मुहं व होठों का बन्द करके जीभ को ऊपर तालु पर लगा देंगे। ओउम का दीर्घ गुंजन, भौरें के उड़ते समय की ध्वनि की तरह करेंगे, जिसमें श्वांस नासिका से गुंजन के साथ बाहर निकलेगा और पूरे मस्तिष्क में कम्पन्न होगा। यह प्राणायाम करते समय अपना ध्यान आज्ञा चक्र भृकुटिद् पर केन्द्रित करेंगे। इस प्रकार 5 से 7 बार दोहरायेंगे। मन एकाग्र होता है, याददाश्त तेज होती है। मानसिक तनाव, उच्चरक्तचाप, हृदयरोग, उत्तेजना में लाभप्रद। 

सूक्ष्म व्यायाम

सूक्ष्म व्यायाम

सूक्ष्म योग क्रियाएं बैठ कर करनी चाहिए | जो नीचे नहीं बैठ सकते वे कुर्सी या खाट पर बैठ या खड़े रह कर कर सकते हैं। मन को लीन करें तो पूरा लाभ मिलेगा | भोजन करते ही तुरंत ये क्रियाएं नहीं करनी चाहिए। सूक्ष्म योग क्रियाओं का संबंध शरीर के अवयवों से रहता है | इसलिए अवयवों के क्रम के अनुसार, सूक्ष्मयोग क्रियाओं का संक्षेप में विवरण यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है | जिस अवयव से सूक्ष्म योग क्रिया संबंधित है, उस अवयव पर मन को केन्द्रित करना आवश्यक है | हर क्रिया शक्ति के अनुसार 15 से 60 सेकंड तक करनी चाहिए |

कपाल भाति प्राणायाम :

कपाल अर्थात मस्तिष्क, भाति अर्थात तेज, प्रकाश आभा, यानि जिस प्राणायाम के करने से आभा, तेज, व ओज बढ़ता हो वह है कपालभाति प्राणायाम विधी:- श्वांस को लम्बा गहरा नासिका के द्वारा फेफड़ों में भरेंगे और लिये गये श्वांस को बिना अन्दर रोके नासाछिद्रों द्वारा प्रयासरत होकर इस प्रकार छोड़ेंगे कि श्वांस को बाहर छोड़ने के साथ ही पेट अन्दर की और पिचके। श्वांस भीतर जा रहा है उस और ध्यान नहीं देते हुए लगातार छोड़ने की क्रिया करनी है। मध्यमगति व मध्यम शक्ति के साथ करें व नये साधक थकने पर कुछ देर बीच में विश्राम कर सकते हैं। श्वांस को अधिक गहराई के साथ छोड़ने का प्रयास करें। और दिन प्रतिदिन लगातार करने की अ

सब रोगों की प्राणायाम

प्राणायाम

प्राणायाम दो शब्दों के योग से बना है-(प्राण+आयाम) पहला शब्द "प्राण" है दूसरा "आयाम"। प्राण का अर्थ जो हमें शक्ति देता है या बल देता है। सरकारी अस्पतालों में भर्ती मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराने वाले डॉक्टर अब प्राणायाम, योग, ध्यान करके खुद भी स्वस्थ बनाने में जुट गए हैं। योग-प्रक्रियाओं के अन्तर्गत प्राणायाम का एक अतिविशिष्ट महत्त्व है। पतंजलि ऋषि ने मनुष्य-मात्र के कल्याण हेतु अष्टांग योग की विधान किया है। प्रकृति का नियम है कि प्रत्येक चल वस्तु, प्रत्येक क्रियाशील जड़ या चेतन में समय समय पर कुछ न कुछ खराबी निरंतर कार्य करने के कारण आ जाती है। मनुष्य का शरीर इसका अपवाद नही