हिन्दी

अनुलोम विलोम प्राणायाम

अनुलोम विलोम प्राणायाम

दांये हाथ को ऊपर उठायें। दांये हाथ के अंगुठे से दाहिनी नासिका बन्द करें और बांयी नासिका से श्वांस को लम्बा गहरा धीरे धीरे फेफड़ों में भरेंगे। पूरा श्वांस भरने के पश्चात दाहिने हाथ की अनामिका अंगुली से बांयी नासिका को बन्द कर देंगे व अंगूठे को दांयी नासिका से हटा लेंगे अर्थात दांयी नासिका खोलते हुये, लिये गये श्वांस को बिना अन्दर रोके दांयी नासिका से धीरे धीरे पूरा बाहर छोड़ देंगे तथा बाहर भी श्वांस को बिना रोके जिस नासिका (दांयी) से श्वांस बाहर छोड़ा है उसी नासिका से श्वांस को धीरे धीरे फेफड़ों में भरेंगे। पूरा श्वांस भरने के पश्चात दायें हाथ के अंगुठे से दाहिनी नासिका बंद कर देंगे और बांयी Read More : अनुलोम विलोम प्राणायाम about अनुलोम विलोम प्राणायाम

भ्रस्त्रिका प्राणायाम

भ्रस्त्रिका प्राणायाम
  • श्वांस को लम्बा गहरा धीरे-धीरे नाक के द्वारा फेफड़ों में डायफ्राॅम तक भरेंगे पेट नहीं फुलायेंगे और श्वासं बिना अन्दर रोके, लिये गये श्वांस को नासिका द्वारा धीरे धीरे पूरा ही बाहर छोड़ देंगे तथा बाहर भी श्वांस को बिना रोके पूर्व की भांति श्वासं को भरेंगे। इस अभ्यास को जारी रखें।
  • नये साधक थकने पर बीच में कुछ देर के लिये विश्राम कर सकते हैं। तथा अपने उथले श्वासं की गहराई को बढ़ाने का प्रयास करें।
  • गर्मी में 3 मिनट व सर्दी में 7 मिनट तक किया जा सकता है।
Read More : भ्रस्त्रिका प्राणायाम about भ्रस्त्रिका प्राणायाम>

व्यायाम व जिम्नास्टिक

व्यायाम व जिम्नास्टिक

1. शरीर के केवल बाह्य मांसपेशियों व मसल को कड़ा व मजबूत बनाता है।

2. इसको करने से शरीर में आलस्य थकावट आती है तथा दूसरे परिश्रम करने की अनिच्छा होती है।

3. अधिक वृद्ध, स्त्री, कमजोर, रोगी वयस्त व्यक्ति नहीं कर सकते।

4. अधिक समय व शक्ति की जरूरत होती है

5. खेल, व्यायाम में हम दूसरी वस्तु या व्यक्ति पर निर्भर रहते हैं, जिसके अभाव में व्यायाम नहीं कर सकते।

6. इसके अभ्यास से शरीर में कठोरता व भारीपन होता है, जिससे ढलती उम्र में वात, गठिया रोग हो जाते हैं। शरीर अल्पायु हो जाता है जैसे - पहलवान, कुश्ती लड़ने वालों का। Read More : व्यायाम व जिम्नास्टिक about व्यायाम व जिम्नास्टिक

सेतुबंधासन आसन से लाभान्वित

सेतुबंधासन

भूमि पर सीधे लेट जाइए। दोनों घुटनों को मोड़कर रखिए। कटिप्रदेश को ऊपर उठा कर दोनों हाथो को कोहनी के बल खड़े करके कमर के नीचे लगाइये। अब कटि को ऊपर स्थिति रखते हुए पैरों को सीधा किजिए। कंधे व सिर भूमि पर टिके रहें। इस स्थिति में 6-8 सेंकण्ड रहें। वापस आते समय नितम्ब एवं पैरों को धीरे-धीरे जमीन पर टेकिए। हाथो को एकदम कमर से नहीं हटाना चाहिये। शवासन में कुछ देर विश्राम करके पुनः अभ्यास को 4-6 बार दोहराएं। Read More : सेतुबंधासन आसन से लाभान्वित about सेतुबंधासन आसन से लाभान्वित

हाथों व कन्धे के व्यायाम

हाथों व कन्धे के व्यायाम
  • हाथों की अंगुलियों को परस्पर मिलाते हुये मोड़ना, हाथों को सामने की और फैलाकर अंगुलियों के पोरों को धीरे-धीरे मोड़ें सीधा करें। इसके पश्चात अंगूठे व अंगुलियों को मोड़कर दबाते हुए मुक्का जैसी आकृति बनायें फिर धीरे-धीरे खोलें ऐसा 5-7 बार करें। अब अंगुठे को मोड़कर अंगुलियों से दबाते हुए दोनों हाथों की मुटिठयों को बन्द करके क्रमशःदोनों और घुमायें। कोहनियां सीधी रहनी चाहिये।
  • अब कोहनियों के लिये कोहनी को दूसरे हाथ की हथेली पर रखकर दोनों और गोल घुमायें।
  • अब कन्धे के लिये दोनो कन्धों को क्रमशः ऊपर नीचे करें फिर आगे व पीछे की और गोल घुमायें।
Read More : हाथों व कन्धे के व्यायाम about हाथों व कन्धे के व्यायाम>

ऐसे करें उत्तानपादासन

ऐसे करें उत्तानपादासन

 पीठ के बल लेट जायें। हथेलियां भूमि की और, पैर सीधे, पंजे मिले हुये हों । अब श्वांस भरकर एक पैर को 1 फुट तक धीरे धीरे ऊपर उठायें। 10 सैकण्ड रोके फिर धीरे धीरे पैरों को नीचे भूमि पर टिकायें। फिर क्रमशः दूसरे पैर से करें। 3 से 6 बार ।

अब यही क्रिया दोनों पैरों को एक साथ उठाकर क्रमशः करें। 3 से 6 बार ।

कमरदर्द वाले एक एक पैर से ही क्रमशः इस अभ्यास को करें।

कब्ज, गैस, मोटापा, पेटदर्द, नाभि का टलना, कमरदर्द, हृदयरोग में लाभप्रद। Read More : ऐसे करें उत्तानपादासन about ऐसे करें उत्तानपादासन

भुजंगासन

भुजंगासन

भुजंगासन:- पेट के बल लेटकर दोनों हथेलियां भूमि पर रखते हुये हाथों को छाती के दोनों और रखें। कोहनियां ऊपर उठी हुई तथा भुजायें छाती से सटी हुई होनी चाहिये। पैर सीधे तथा पंजे आपस में मिले हुये हों। पंजे पीेछे की और तने हुये भूमि पर टिके हुये हों। श्वांस अन्दर भरकर छाती व सिर को धीरे धीरे ऊपर उठाइये। नाभि के पीछे वाला भाग भूमि पर टिका रहे। सिर को उपर उठाते हुये गर्दन को जितना पीछे मोड़ सकते हैं, मोड़ना चाहिये। इस स्थिती में करीब 10 से 30 सैकण्ड जितनी देर यथाशक्ति श्वासं रोक सके रूकें। श्वांस छोड़कर पूर्व स्थिती में आ जायें। सवाईकल, स्पोंडलाइटिस, पेट के रोग, स्लीपडिस्क स्त्रीरोग में लाभप्रद। 
Read More : भुजंगासन about भुजंगासन

उद्गीथ प्राणायाम

उद्गीथ प्राणायाम

लम्बा, गहरा श्वांस फफड़ों में भरें और प्रणव का दीर्घ उच्चारण अर्थात नाभि की गहराई से करें। श्वांस भरने में 5 सैकण्ड व छोड़ते समय दो गुना अर्थात 10 सैकण्ड का समय लगावें। स्वर को मधुर व लयबद्ध बनाते हुये आधा समय ‘ओ’ का व आधा ‘म’ का मुहं बन्द रखते उच्चारण करें।

यह प्राणायाम 3 से 5 बार करें। इससे एकाग्रता आती है, मेरूदण्ड, फेफड़े मजबूत होते हैं, श्वांस की गति पर नियन्त्रण होता है। मानसिक शान्ति मिलती है।

 

  Read More : उद्गीथ प्राणायाम about उद्गीथ प्राणायाम

Pages