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WhatsApp में जल्द नंबर बदलने पर नहीं होगी झंझट

WhatsApp में जल्द आएगा ये नया फीचर, नंबर बदलने पर नहीं होगी झंझट

इस समय व्हाट्सएप के 1.5 अरब एक्टिव मंथली यूजर्स हैं, जो प्रतिदिन 60 अरब मैसेज एक्सचेंज करते हैं. भारत में व्हाट्सऐप के दो करोड़ यूजर्स हैं.| WhatsApp ने बीटा अपडेट में एक फीचर को जारी किया है, जिसकी मदद से ios, एंड्रॉयड और विंडोज यूजर्स जल्द ही बिना किसी झंझट के अपने डेटा को एक नए नंबर में ट्रांसफर कर पाएंगे. नया 'चेंज नंबर' फीचर फिलहाल गूगल प्ले स्टोर पर 2.18.97 एंड्रॉयड बीटा अपडेट के साथ उपलब्ध है.

U.P के CM योगी आदित्यनाथ से 'सीधी बात' | Bharat Tak

योगी आदित्यनाथ ने देश के नंबर 1 न्यूज़ चैनल ‘आजतक’ के दोबारा शुरू हुए फ्लैगशिप शो ‘सीधी बात’पर पहुंचे थे. यहां उन्‍होंने शो की एंकर श्‍वेता सिंह के सवालों के बेबाक जवाब दिए. यहीं नहीं उन्‍होंने भविष्‍य में प्रधानमंत्री पद को लेकर अपने विचार भी साझा किए.

उत्‍तर प्रदेश के CM योगी आदित्‍यनाथ से जब पूछा गया कि क्या आप भविष्य में कभी अपने आप को भारत के प्रधानमंत्री के रूप में देखते हैं, तो उन्होंने कहा, “नहीं, मैं किसी पद के लिए दावेदार नहीं हूं, मैं एक योगी हूं, मुझे पार्टी ने प्रदेश की जनता की सेवा का अवसर दिया है, मैं प्रदेश की जनता की सेवा कर रहा हूं.”

लिंगायत क्यों चाहते हैं हिंदुओं से अलग होना

लिंगायत समुदाय लंबे समय से मांग कर रहा था कि उन्हें हिंदू धर्म से अलग घोषित किया जाए। इस मांग को लेकर राज्य सरकार ने हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस नागामोहन दास की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया था। इस समिति ने लिंगायत समुदाय के लिए अलग धर्म के साथ अल्पसंख्यक दर्जे की सिफारिश की थी, जिसे सिद्धारमैया कैबिनेट ने मंजूरी दे दी है।लिंगायत भारतवर्ष के प्राचीनतम धर्म का एक हिस्सा है इस धर्म के ज्यादातर अनुयायी दक्षिण भारत में हैं। ये भगवान शिव की स्तुति आराधना पर आधारित है.भगवान शिव जो सत्य सुंदर और सनातन हैं जिनसे सृस्टि का उद्गार हुआ। जो आदि अनंत हैं। हिंदु धर्म मे त्रिदेवों का वर्णन है जिसम

लिंगायत सम्प्रदाय के लोग कौन है

कर्नाटक का बीदर जिला जो कि महाराष्ट्र और तेलंगाना से जुड़ा हुआ है, के लिंगायत सम्प्रदाय के करीब 75000 से अधिक लोग सड़कों पर अपनी पहचान पाने के लिए आ गए. इस लिंगायत समाज के लोगों की कर्नाटक में संख्या करीब 18 प्रतिशत के आसपास है जो कि सबसे बड़ी संख्या है. यही नहीं कर्नाटक से जुड़े महाराष्ट्र और तेलंगाना में भी इस लिंगायत समाज की संख्या बहुत बड़ी तादात में है.

1. बारहवीं सदी में समाज सुधारक बासवन्ना ने इस लिंगायत समाज की स्थापना की थी.

2. बासवन्ना जी का जन्म एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था.

दिवंगत पत्रकार गौरी लंकेश पत्रिके लिंगायत समुदाय से ही आती थीं

दिवंगत पत्रकार गौरी लंकेश पत्रिके लिंगायत समुदाय से ही आती थीं. पिछले साल उनकी हत्या हो गई थी. (फोटोःट्विटर) अपने को हिंदू मानने वाले वीरशैव खुद को 'वीरशैव लिंगायत' भी कह देते हैं. इस नाते से लिंगायत हिंदू धर्म के और करीब लगने लगते हैं. खासकर इसलिए कि बसवन्ना ने लिंगायत 'धर्म' की स्थापना की थी कि नहीं, इसे लेकर मतभेद है. लेकिन सारे लिंगायत खुद को वीरशैव नहीं मानते. वो लिंगायत कहलाना ही पसंद करते हैं. सारा मामला पहचान का है और कोई अपनी पहचान से समझौता नहीं करना चाहता.

अक्कमहाेदेवी वीरशैव लिंगायत संप्रदाय में हुए भक्ति संतों में प्रमुख मानी जाती हैं

अक्कमहाेदेवी वीरशैव लिंगायत संप्रदाय में हुए भक्ति संतों में प्रमुख मानी जाती हैं. (फोटोःविकिमीडिया कॉमन्स) लेकिन बसव और उनके अनुयायी समाज-सुधार पर नहीं रुके. उन्होंने अपना आंदोलन बड़ी गंभीरता से चलाया और अपनी मान्यताओं को एक व्यवस्था की शक्ल दी. इसी व्यवस्था ने वक्त के साथ एक संप्रदाय की शक्ल ले ली. ये बात लिंगायतों को हिंदू धर्म के अंदर चले बाकी भक्ति आंदोलनों से अलग करती है.

गुरु बसव लिंगायत संप्रदाय शुरू करने वाले माने जाते हैं.

गुरु बसव लिंगायत संप्रदाय शुरू करने वाले माने जाते हैं. लेकिन इस बात पर मतभेद भी है. (फोटोःविकिमीडिया कॉमन्स) ऐसे समय में हुए बासवन्ना या गुरु बसव. ब्राह्मण समाज से आने वाले बसव एक समाज-सुधारक थे और उन्होंने जाति प्रथा के खिलाफ खूब काम किया. वो आज़ादी, बराबरी और भाईचारे जैसे मूल्यों पर खूब ज़ोर देते थे और अपने विचारों का प्रसार 'वचन' गाकर करते थे. बसव के लिखे एक वचन का मतलब कुछ यूं निकलता है - 'आत्मा की कोई जाति नहीं होती, वो रीतियों में बंधी नहीं होती' बसव और उनके अनुयायियों ने ब्राह्मणवादी रीति-रिवाज़ों और वेदों को मानने से इनकार कर दिया था. वो मूर्ति पूजा के भी खिलाफ थे.

कौन हैं लिंगायत

कर्नाटक में चुनाव होने वाले हैं. मोटा भाई वहां भी सरकार बनाना चाहते हैं. जैसे उन्होंने त्रिपुरा में सरकार बनाई. या जैसे उन्होंने मेघालय में बना ली. लेकिन ये सब तब होगा, जब सिद्धारमैया उन्हें चैन लेने दें. कर्नाटक में कांग्रेस सरकार चला रहे सिद्धारमैया एक के बाद एक मास्टर स्ट्रोक चल रहे हैं. विधानसभा चुनाव से ऐन पहले उन्होंने कर्नाटक के लिए अलग झंडे का प्रस्ताव बनाकर केंद्र की एनडीए (भाजपा पढ़ें) सरकार के पाले में डाल दिया और अब उन्होंने कर्नाटक में लिंगायत सम्प्रदाय को एक अलग धर्म (अल्पसंख्यक) के रूप में मान्यता देने की कवायद शुरू कर दी है.

सिद्धारमैया लिंगायत धर्मगुरुओं के साथ

सिद्धारमैया लिंगायत

सिद्धारमैया लिंगायत धर्मगुरुओं के साथ. सिद्धारमैया ने ये फैसला इस तरह लिया है कि कम से कम उनके हाथ तो इसमें नहीं ही जलेंगे. (फोटोःट्विटर) लेकिन इस बात से वीरशैव खास खुश नहीं हैं. वीरशैव लिंगायतों के धर्मगुरुओं ने कर्नाटक सरकार को एक ज्ञापन दिया है. इनकी मांग है कि नागमोहन दास पैनल की सिफारिशें ज्यों कि त्यों न मानी जाएं. अगर अलग धर्म का दर्जा दिया ही जाना है तो वीरशैव-लिंगायत नाम से दिया जाए. ऐसा न होने पर उन्होंने प्रदर्शन करने की बात की है. बंदरबांट में किसे क्या मिलेगा?फिलहाल लिंगायत पिछड़े वर्ग में गिने जाते हैं. लेकिन लिंगायतों ने वक्त के साथ काफी कुछ हासिल किया है.

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