अपने दांतों की देखभाल और उनको रखे दूध जैसे चमकीले तथा स्वच्छ

अपने दांतों की देखभाल और उनको रखे दूध जैसे चमकीले तथा स्वच्छ

मुंह और दांतों की देखभाल कैसे करें 

मुंह को मानव अंगों में सबसे ज्यादा अस्थिर या परिवर्तनशील अंग माना जाता है। शरीर को जिंदा रहने के लिए आहार की जरूरत होती है जो सबसे पहले मुंह द्वारा ही ग्रहण किया जाता है। पाचन क्रिया का पहला चरण भी मुंह के भीतर दांत द्वारा ही संपन्न होता है। मुंह का आकार और विशेष रूप से होंठों की बनावट विचारों की अभिव्यक्ति को बहुत अधिक प्रभावित करते हैं। अत: यह स्पष्ट है कि मुंह और इसके प्रमुख हिस्सों जैसे दांत, जीभ और मसूढ़े की सबसे अच्छी देखभाल की जानी चाहिए। दांतों की देखभाल न तो कठिन है और न ही खर्चीली। सिर्फ जरूरत है- बचपन से दांतों की सफाई की आदत डालने की। सुबह और रात में सोने से पहले ब्रश करने और कुछ भी खाने के बाद कुल्ला करने की आदत बच्चों में शुरू से ही डालनी चाहिए। 

बच्चों के दांत  कब और कैसे 

जन्म लेने से पहले मां के गर्भ में ही बच्चे के बीस दांतों का पहला सेट बनने की प्रक्रिया की शुरुआत हो जाती है क्योंकि ये मसूढ़े गर्भस्थ शिशु के शरीर के अन्य भागों के रूप हैं और मां के आहार से इनका निर्माण होता है इसलिए गर्भावस्था में मां के खानपान पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। गर्भकाल के दौरान यदि मां संतुलित और पौष्टिक आहार लेती है तो गर्भस्थ शिशु का सही विकास होता है। 

बच्चों के आहार पर भी विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। जब तक बच्चों के दांत निकलते रहते हैं यानी किशोरावस्था तक संतुलित पौष्टिक आहार दिया जाना चाहिए। खान-पान की अच्छी आदत पूरी जिंदगी बनी रहे तो दूसरे अंगों की तरह दांत भी स्वस्थ रहेंगे। शारीरिक स्वास्थ्य के लिए जो पौष्टिक आहार लेने की सलाह दी जाती है वही दांतों के स्वास्थ्य के लिए पर्याप्त है। दांतों के स्वास्थ्य के लिए इस बात पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए कि कुछ भी मीठा खाने के बाद कुल्ला करें और मीठा खाने में थोड़ा नियंत्रण रखें क्योंकि दांतों में चिपकी चीनी के फर्मन्टेंशन से एसिड बनता है जो दंतक्षय का प्रमुख कारण है।

प्राय: दो-ढाई साल की उम्र तक बच्चे के बीस दूध के दांत निकल चुके होते हैं। कभी-कभी ये दूध के दांत टेढ़े-मेढ़े निकलते हैं इसलिए बच्चे को दंत रोग विशेषज्ञ के पास समय-समय पर ले जाना चाहिए ताकि कोई कमी हो तो डॉक्टर उसे समय से ठीक कर सके। अक्सर बच्चों के दांतों में कीड़े लग जाने से कैविटी बन जाती है जिसमें खाना जाकर सड़ता है और उससे इन्फेक्शन होता है। डॉक्टर कीड़े से क्षतिग्रस्त दांत का सही उपचार समय से कर सकते हैं। कैविटी को विशेष प्रकार के सीमेंट द्वारा भर देने से आगे नुकसान नहीं होता। शिशुओं के दांतों की सफाई बड़ों को नित्य नियम से करनी चाहिए। कुछ भी खाने के बाद मुंह धोना चाहिए ताकि अन्न के कण दांतों की बीच फंसकर सड़न न पैदा कर सकें। जब बच्चा इतना बड़ा हो जाए कि वह स्वयं ब्रश कर सके तो उसे स्वयं सही ढंग से ब्रश करने का तरीका बताएं। रात में सोने से पहले ब्रश करने की आदत बचपन से ही डालें जो बड़े होने तक बनी रहेगी और दांत खराब होने से बचे रहेंगे। सही ब्रश और टूथपेस्ट का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। ब्रश के खराब होने से पहले ही ब्रश को बदल डालें और हफ्ते में एक बार ब्रश को गरम पानी में थोड़ी देर डुबोकर साफ करें। ब्रश करने के बाद दांतों और मसूड़ों की उंगलियों से अच्छी तरह मालिश की जानी चाहिए। 

बहुत सारी कंपनियां दावा करती हैं कि उनके उत्पाद दांतों को चमकदार व मजबूत बनाते हैं लेकिन अभी तक इनकी सत्यता एवं प्रामाणिकता दंत रोग विशेषज्ञों के प्रयोग का विषय बनी हुई है। वैज्ञानिक तौर पर इन्हें स्वीकृति नहीं दी जा सकती। दांतों को मजबूत व चमकदार बनाए रखने का एकमात्र कारगर उपाय है दांतों की समुचित सफाई।

दंत क्षय को दूर करने का सबसे आसान और सस्ता साधन है फ्लोराइडयुक्त पानी जनसामान्य को उपलब्ध कराना। प्रति दस हजार गैलन में एक हिस्सा फ्लोराइडयुक्त पानी जलापूर्ति के माध्यम से जनसामान्य को सुलभ होना चाहिए। गर्म जलवायु वाले इलाकों में कम फ्लोराइड वाला पानी उपलब्ध है। शोध से ज्ञात हुआ है कि जिन बच्चों को जन्म से फ्लोराइडयुक्त पानी मिलता है उनमें फ्लोराइड रहित क्षेत्र के बच्चों की अपेक्षा पैंसठ फीसदी कम दंत क्षय होता है और दांतों मैं कैविटी बनने की शिकायत कम होती है। फ्लोराइड की जरूरत सिर्फ बच्चों को ही नहीं बल्कि हर उम्र के व्यक्ति को होती है।

टेढ़े-मेढ़े दांत या मैलऑक्लूशन का होना   

आजकल बच्चों के टेढ़े-मेढ़े दांत बहुत देखने को मिलते हैं। जिसे दांतों का मैलऑक्लूशन कहते हैं। इसके लिए किसी एक कारण को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। कुछ मामलों में तो यह दोष जन्मजात होता है किंतु कुछ में बाद में अन्य कारणों से होता है जबकि कुछ मामलों में दोनों के मिले-जुले प्रभाव के कारण होता है। 

यदि किसी बच्चे की छोटी हड्डियां अपने किसी पूर्वज की मिलती हैं तो हो सकता है कि बड़े होने पर उसके दांत किसी पूर्वज से मिलें। परिणामस्वरूप दांतों में कई प्रकार की अनियमिताएं आ सकती हैं। बहुत लंबे समय तक अंगूठा चूसने, नाखून कुतरने या देर तक सोने की आदत से अतिरिक्त दबाव पड़ने के कारण चेहरे में विकृति आ जाती है। एक या अधिक दूध के दांत यदि बहुत जल्दी टूट जाते हैं तो बाकी दांत भी खिसकने लगते हैं। इस तरह स्थायी दांतों के लिए जगह कम बचती है। यदि मोलर दांत जल्दी टूटता है तो आजकल दंत विशेषज्ञ एक डिवाइस वहां पर लगा देते हैं ताकि स्थायी दांत के लिए पर्याप्त जगह बची रहे। कभी-कभी एक या अधिक अस्थायी या जिन्हें दूध का दांत कहते हैं काफी लंबे समय तक टूट नहीं पाता और दूसरा दांत निकलना शुरू हो जाता है। ऐसी स्थिति में दंत रोग विशेषज्ञ उस दांत का एक्स रे लेकर यह देख लेते हैं कि स्थायी दांत की स्थिति क्या है?  

बच्चे के दांतों का चेकअप करवाते रहना चाहिए ताकि डेंटिस्ट समय से उनके टेढ़ेपन का पता लगा सकें। नियमित रूप से दांतों का चेकअप करवाते रहने से डॉक्टर यह भी सलाह दे सकेगा कि दांतों का टेढ़ापन स्वयं ठीक हो जाएगा या फिर कोई उपचार करना होगा। किस उम्र में क्या उपचार उपयुक्त होगा यह भी दंत रोग विशेषज्ञ ही बता पाएगा। 

कई मामलों में दांतों को अधिक टेढ़ेपन से बचाया जा सकता है। यदि समय से इसके बचाव के उपाय किए जाएं। अब तो तरह-तरह की आधुनिक सुविधाएं दंत चिकित्सा उपलब्ध हो गयी हैं, जिनसे दांतों के टेढ़ेपन को काफी हद तक सुधारा जा सकता है। आर्थोडॉक्टिक उपचार में समय ज्यादा भी लग सकता है लेकिन इस पद्धति में काफी सफलता मिलती है। 

कभी-कभी खेल के दौरान जबड़े की हड्डी टूटने से या सीधे दांतों को क्षति पहुंचती है और पूरा दांत या आधा दांत टूट जाता है। इसे दंत चिकित्सक सुधार सकते हैं। आधे टूटे दांतों को इस कुशलता से नीचे जोड़कर लगा सकते हैं कि देखने पर भी जोड़ का पता नहीं चलता। इसी तरह पूरे उखड़े दांत को फिर से उसी स्थान पर जोड़ा जा सकता है। इसके लिए जैसे ही दांत टूटे उसे पानी में डाल दें और तुरंत दंत रोग विशेषज्ञ के पास जाकर उसे फिर से लगवा लें। अपना ही टूटा दांत फिर से उसी जगह पर स्थायी रूप से लगवाया जा सकता है। दांतों के स्वास्थ्य के लिए निम्नलिखित चार नियमों का पालन करें- 

1. संतुलित पौष्टिक आहार लें, जिसमें मीठे की मात्रा कम हो।

2. दांतों में कोई तकलीफ न हो फिर भी साल में एक बार दांतों का चेकअप अवश्य करवा लें। 

3. कुछ भी खाने के तुरंत बाद मुंह को अच्छी तरह पानी से साफ कर लें। 

4. फ्लोराइडयुक्त पानी पिएं। बच्चों की दांतों पर दंत रोग विशेषज्ञ द्वारा सीधे फ्लोराइडइ का सोल्यूशन लगवाएं ताकि दंतक्षय से बचाव हो सके।

इन चार नियमों का यदि अच्छी तरह पालन किया जाए तो बीस अस्थायी दूध के दांत तब तक स्वस्थ और ठीक-ठाक रहेंगे जब तक कि इनकी जगह स्थायी बत्तीस दांत नहीं ले लेते और बाद में इन नियमों को अपनाते रहें तो स्थायी दांत पूरी जिंदगी स्वस्थ रहकर आपका साथ देंगे। 

यदि किशोरावस्था में दांतों की अच्छी तरह से देखभाल की गयी होगी तो वयस्क होने पर तब स्थायी बत्तीस दांतों का सेट पूरा हो जाता है तो वह स्वस्थ हड्डी और मसूढ़ों के ऊतकों की सहायता से जिंदगी भर मजबूत बने रहते हैं। बच्चों के दूध के दांत दंत क्षय के कारण टूटते हैं जबकि अधिकांश वयस्कों के दांत आधार की हड्डी, मसूढ़े एवं ऊतकों में आए विकारों के कारण टूटते हैं। मसूढ़े से जुड़ी आम बीमारियां हैं- जिंजिवाइटिस (मसूड़ों में सूजन), पेरीडान्टाइटिस और पेराडान्टोसिस। बाद की दोनों स्थितियों को सामान्यत: पायरिया कहते हैं। जिंजिवाइटिस में मसूड़े लाल पड़ जाते हैं, उनमें सूजन और कड़ापन रहता है, उनसे जल्दी ही रक्तस्त्राव होने लगता है।

इसका मुख्य कारण मुंह की सफाई ढंग से न करना होता है। जिसकी वजह से अन्न कण और कैलकुलस (टारटार) दांतों के ऊपर जमा होने लगते हैं और दांतों के आसपास के कोमल ऊतकों को क्षति पहुंचाते हैं। इस स्थिति से छुटकारा पाने के लिए संग्रहीत पदार्थ निकाला जाना जरूरी है। हर बार खाना खाने के बाद अच्छी तरह से ब्रश से दांतों और मसूड़ों को साफ करने से और कभी-कभी फ्लाक का इस्तेमाल करने से बचाव हो सकता है। जब दांत अधिक गंदे हो जाते हैं या जमाव ज्यादा हो जाता है और कड़ापन ले लेता है तो दंत रोग विशेषज्ञ की सहायता लेना अनिवार्य हो जाता है। डेंटिस्ट उपकरणों की सहायता से दांतों की अच्छी तरह सफाई कर देते हैं। टारटार जो दांतों को पथरीला रूप दे देता है उसे खुरचकर निकाल देने से आराम मिल जाता है।

यदि जिंजिवाइटिस का समय से उपचार नहीं किया गया तो इससे पैरीडान्टाइटिस हो सकती है। इस स्थिति में मसूड़े बुरी तरह सूज कर कड़े हो जाते हैं। मसूड़े, दांत की ग्रीवा (नेक) से अलग हो जाते हैं और मसूढ़ों में रिक्त स्थान बन जाते हैं, जो सूज जाते हैं। ज्यादा बुरी स्थिति होने पर दांत को आधार देने वाली हड्डी क्षतिग्रस्त हो जाती है और दांत ढीले पड़ जाते हैं। इस स्थिति का उपचार यदि नहीं किया गया तो दांत इतने अधिक ढीले पड़ सकते हैं तो निकालना जरूरी पड़ जाता है। वयस्कों में मसूढ़े संबंधी अन्य बीमारी भी पायी जाती है जिसे पेरीडोन्टोसिस कहते हैं। उस स्थिति में मुंह की अच्छी सफाई रखने पर भी दांत को सहारा देने वाली हड्डी धीरे-धीरे खराब हो जाती है। यह विकास प्राय: संतुलित आहार न लेने की वजह से होता है। पेरीडॉन्टल, डिस्आर्डर से बचाव के लिए दंत रोग विशेषज्ञ से नियमित जांच कराना जरूरी है। मुंह की सफाई कम से कम दो बार ब्रश करने की आदत और नियममित रूप से कैल्शियम युक्त संतुलित और पौष्टिक आहार अत्यावश्यक है।

कुछ लोगों को अक्सर जिंजिवाइटिस हो जाती है। साथ ही मसूढ़ों में जख्म बन जाता है, जिसे विन्सेंस इंफेक्शन या फ्रेंच माउथ भी कहते हैं। अक्सर लोग लापरवाही बरतते हैं और इसका सही उपचार समय से नहीं कर पाते। उनकी यह अज्ञानता या लापरवाही घातक सिद्ध हो सकती है। यह बीमारी बहुत तेजी से फैलती है और जिसके दुष्परिणाम देखने को मिलते हैं। मंुह की गंदगी और मुंह के ऊतकों की प्रतिरोधक क्षमता कम होने के कारण स्थिति बदतर हो जाती है। बीमारी की तीव्र स्थिति में मुंह से बदबू आती है पीड़ा, सूजन और मसूड़ों में घाव और लाल बनने की अधिक शिकायत रहती है। ये लक्षण पैदा होते ही तुरंत दंतरोग विशेषज्ञ से संपर्क करना चाहिए। नहीं तो स्थिति बिगड़ती जाएगी और फिर इलाज में लंबा समय लगेगा और मसूड़ों के ऊतकों को बहुत नुकसान होगा, कभी-कभी ये लक्षण कुछ महीनों बाद समाप्त हो जाते हैं लेकिन फिर अचानक कभी-कभी पैदा हो सकते हैं।  

मुंह के कोमल ऊतक अन्य कई प्रकार के संक्रमणों एवं विकारों के लिए जिम्मेदार होते हैं- जैसे थ्रस, एफथास, स्टोमेटाइटिस (कैंकरसोर्स), पेम्पाइगस, एटीनामाइकोसेस, स्मोकर्स पैचेज और बर्निग टंग।   मुंह का कैंसर 

हर वर्ष हजारों लोग मुंहगुहा के कैंसर से पीडि़त होते हैं। इनमें से एक चौथाई लोग मौत के शिकार हो जाते है। हालांकि कैंसर का मुख्य कारण अभी तक पता नहीं लगाया जा सका है। कैंसर से पीडि़त व्यक्ति के मुंह में निम्नलिखित में से एक या अधिक लक्षण मिल सकते हैं -  
1. क्रॉनिक इन्फेक्शन, स्मोकर्स स्काट्स, नकली दांत ठीक तरह से फिट न हो पा रहे हों, दांत टूट ये हों या फिर दांत खुरदरे व दांतेदार हो ऐसी स्थिति में तुरंत इलाज द्वारा सुधार करके कैंसर के घातक परिणामों से बचा जा सकता है। 

2. होंठों का कैंसर सनबर्न, पाइपस्मोकिंग, नाखून कुतरने की लत, पिन या कोई कड़ी चीज दांत से पकड़े रहने की बुरी आदत से जुड़ा है। कैंसर की वृद्धि देखने में बहुत भिन्नता लिए होते हैं, इसलिए प्रारंभिक अवस्था में इसका निदान बहुत कठिन होता है। यदि शुरू में ध्यान दिया जाए तो मुंह के कैंसर को दूर किया जा सकता है। कोई तकलीफ न होने पर भी यदि साल में कम से कम एक बार दांत रोग विशेषज्ञ से परीक्षण कराते रहें तो दांत संबंधी बहुत सारी बीमारियों से बचाव हो सकता है। कोई भी भाव मुंह में दिखाई पड़ते ही चिकित्सक से तुरंत संपर्क करना चाहिए। 

दांत में दर्द का होना 

प्राय: दांतों में समुचित देखभाल न करने के कारण दांतों में दर्द की शिकायत होती है किंतु अधिकांश मामलों में दांत के दर्द का कारण दंत क्षय या दुर्घटना में चोट लगने के कारण दांत के भीतर स्थित नसों के सिरे पर पड़ने वाले दबाव की प्रतिक्रिया का परिणाम होता है। ऐसी दशा में मरीज पीड़ा देने वाले दांत का पता लगा सकते हैं क्योंकि अन्य कण या गरम अथवा ठंडा पानी जब भी कैविटी के भीतर जाएगा तो पीड़ा होगी। यदि दांत की जड़ के सिरे पर सूजन के कारण पीड़ा होती है तो प्रभावी दांत का पता लगाना मुश्किल होता है। 

यदि पल्प या नस जो दांत के भीतर रहती है वह मर जाती है और उसका दंत रोग विशेषज्ञ द्वारा सही उपचार नहीं कराया जाता तो जड़ के सिरे पर जख्म हो सकता है। विशेष रूप से बच्चों में संक्रमण जबड़े की हड्डी और मसूड़े से छिद्र बनाते हुए मुंह में खुलता है और मसूड़े पर फोड़ा सा बन जाता है। जिसे गम बॉयल कहते हैं। एंटीबायोटिक और एंटीइन्फलामेंट्री दवाओं के अलावा ऊतकों के निर्माण के लिए दवा की जाती है। कभी-कभी तो दवा से तकलीफ ठीक हो जाती है। जब दवा असर नहीं करती तो संक्रमित दांत निकालना पड़ता है।  तंत्रिका तंत्र का जटिल रूप जबड़े एवं आस-पास के हिस्से में होता है। इसलिए प्राय: संक्रमित दांत का पता लगाना मुश्किल हो जाता है। यदि वह दांत क्षरित होता है तो वहां लौंग का तेल का फाहा वहां रखने से या दर्द निवारक गोली खाने से थोड़ी देर के लिए दर्द से आराम मिल जाता है। गाल के ऊपर ठंडे या गरम पानी में भीगा कपड़ा रखने से थोड़ा आराम मिलता है। लेकिन उपयुक्त यही होगा कि दंत चिकित्सक से उपचार कराएं।  

दांतो का टूटना 

कभी-कभी दांतों की पूरी देखभाल करने के बावजूद दांत टूटने की समस्या हो सकती है और जो दांतों की उपेक्षा करते हैं। उनके भी दांत टूटते हैं। ऐसे मामले में टूटे दांतों की जगह नकली दांत लगवा लेने चाहिए ताकि चबाने की क्षमता पूर्ववत बनी रहे।   

एक दांत टूटने से पूरा दांतों का चाप (डेंटल आर्च) कमजोर पड़ जाता है। समीपवर्ती दांत और सामने विपरीत जबड़े के दांत अपनी सामान्य स्थिति से थोड़ा खिसक जाते हैं। दांत के अपनी जगह से खिसकने से बाकी दांतों में अतिरिक्त दबाव पड़ता है, जिससे आधार की हड्डी और सहारा देने वाले कोमल ऊतक क्षतिग्रस्त होते हैं। थोड़ा सा भी दांत के सरकने से अन्न कण दो दांतों के बीच की जगह पर फंस जाते हैं, जिससे कोमल ऊतकों को तकलीफ होती है और घर्षण के परिणामस्वरूप प्राय: मसूड़े की बीमारियां जिन्हें पेरीडेन्टलडिसीज कहते हैं, हो जाती हैं। दांत के चाप की स्थिति को पूर्ववत बनाये रखने के लिए टूटे दांत की जगह दूसरा दांत तुरंत लगवाना चाहिए। सामने के टूटे दांत को चेहरे की सुंदरता बनाए रखने के लिए और चबाने की क्षमता बनाए रखने के लिए लगवाना अनिवार्य है। दंत चिकित्सक की सलाह पर आप अस्थायी दांत लगवा सकती हैं या फिर निकल सकने वाला दांत भी लगाया जा सकता है। उखड़े हुए दांतों की जगह नये दांत लगवाते रहने से मुंह की आकृति में परिवर्तन नहीं आ पाता और फिर हो सकता है भविष्य में आपको पूरे नकली दांतों के सेट की जरूरत ही न पड़े। 

नकली दांत या डेंचर कब और कैसे 

समय के साथ दांत टूटने की प्रक्रिया को रोका नहीं जा सकता है। यह जरूर है कि दांतों की सफाई पर ध्यान देने और पोषक आहार लेते रहने से दांतों की चमक और मजबूती बनी रहती है और दांत नीरोग रहते हैं। शरीर के बाकी अंगों की ही तरह उम्र के साथ-साथ दांत भी खराब होने लगते हैं। दंत चिकित्सक की सलाह पर क्षतिग्रस्त कमजोर दांतों को निकलवाकर पूरा डेंचर बनवाया जा सकता है। नकली दांत लगवाने से चेहरा पहले जैसा हो जाता है और आसानी से सब कुछ खाया जा सकता है। लेकिन फिर भी असली दांत और नकली दंतावली (डेंचर) में अंतर तो होता ही है। शुरू में डेंचर को लगाना सीखना पड़ता है और कुछ दिनों तक जब तक अच्छी तरह अभ्यास नहीं हो जाता चबाने या बोलने में थोड़ी परेशानी हो सकती है। निचले जबड़े की दंतावली को यथास्थान लगवाए रखने में थोड़ी दिक्कत होती है लेकिन अभ्यास और दृढ़ इरादे से यह परेशानी दूर हो जाती है। 

स्वाभाविक दांतों की ही तरह नकली दांतों की भी नियम से रोजाना ब्रश से साफ करना पड़ता है। वैसे तो खाने के बाद दांतों को साफ करना चाहिए दंत चिकित्सक की सलाह के अनुसार ही नकली दांतों की सफाई की जानी चाहिए। किस चीज से और कैसे सफाई की करें यह जरूर पता करना चाहिए और समय-समय पर नकली दांतों की भी जांच दंत चिकित्सक से करवाते रहनी चाहिए। 

उम्र के साथ-साथ जबड़े की हड्डी का ढांचा भी सिकुड़ कर छोटा होता रहता है इसलिए कुछ समय बाद दंतावली थोड़ी ढीली हो सकती है। ऐसी स्थिति में दंतावली नयी बनवानी पड़ सकती है या फिर मुंह के आकार के अनुसार पुरानी दंतावली में पर्याप्त परिवर्तन दंत रोग विशेषज्ञ से करवाएं। व्यक्ति को कभी भी अपने आप दंतावली ठीक करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। इससे मुंह के कोमल ऊतकों और जबड़े के मसूड़ों को क्षति पहंुच सकती है। हमेशा दंत चिकित्सक से डेंचर की फिटिंग करवाएं। ढीले या गलत नाप का डेंचर लगाने से मसूढ़ों को भारी नुकसान पहंुच सकता है। यहां तक कि इससे मुंह का कैंसर भी हो सकता है। कमजोर या टूटे हुए डेंचर लगाना भी नुकसानदेह हो सकता है। ऐसी स्थिति में नकली दांतों का दो सेट रखना उपयुक्त होता है। 

बदबूदार सांस का कारण 

सांस की बदबू का कारण मुंह की बीमारी हो सकती है या फिर मुंह की ठीक तरह से सफाई न करने पर भी सांसों से दुर्र्गध आ सकती है। नाक, गले या फेफड़े और कभी-कभी पेट में संक्रमण की वजह से बदबू आ सकती है। यदि मुंह साफ और स्वच्छ है ओर दांत भी ठीक स्थिति में है लेकिन फिर भी मुंह से बदबू आती है तो फिजीशियन से चेकअप कराएं। फेफड़े का कैंसर, फेफड़े में संक्रमण, मधुमेह से भी बदबू आ सकती है। 

माउथवाश थोड़ी देर तक प्रभावी होता है। सांस की बदबू का सही कारण जानकर उचित उपचार किया जाना चाहिए। मुंह की सफाई के लिए सादा पानी ही पर्याप्त होता है। इस तरह अगर आप शुरू से ही अपने और बच्चों के दांतों का खयाल रखेंगी तो आपका परिवार हमेशा तो आपका परिवार हमेशा स्वस्थ और हंसता-खिलखिलाता रहेगा।समय से पहले दांतो की क्षति को रोका नहीं जा सकता लेकिन चिकित्‍सक की सलाह से दांतों की सुरक्षा के उपाय अपनाये जा सकते हैं।

 

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