एक माँ का अपने बच्चों के साथ सोना कितना जरूरी है आइए जानें इस प्रकार

एक माँ का अपने बच्चों के साथ सोना कितना जरूरी है आइए जानें इस प्रकार

माँ अपने बच्चो को स्लीपिंग का सीधा सा अर्थ है, अपने बच्चे के साथ सोना। क्योंकि, आजकल अधिकतर माँ कुछ ही दिनों में अपने बच्चे को खुद से अलग सुलाती हैं। लेकिन, क्या आपने कभी यह जानने की कोशिश की है कि आपके बच्चे के लिए को-स्लीपिंग कितना फायदेमंद है।

हालांकि, भारत में बच्चों के साथ सोना सहर्ष स्वीकार किया गया है, लेकिन वहीं दूसरे देशों की बात करें तो वहां इसकी कोई मान्यता नहीं है। देखा जाए तो इसके दो मायने  हो सकते हैं। एक तो यह है कि आप अपने बच्चे को एक ही कमरे में सुलाते हैं, लेकिन आप दोनों का बेड एक-दूसरे से अलग हो सकता है। वहीं दूसरी ओर देखें तो माँ और बच्चे एक ही बेड पर साथ होते हैं। जिसे मेडिकल दृष्टिकोण से भी उचित माना गया है। आमतौर पर, अपने देश में जन्म के कुछ महीने तक माँ अपने बच्चों के साथ सोती हैं। वहीं उदाहरण के लिए, यदि बात करें दक्षिण भारत की तो यहाँ जन्म के तुरंत बाद से ही बच्चे को पालने में डालने की परंपरा है।

इतना ही नहीं, एक शोध में यह बात सामने आई है कि जो माँ अपने बच्चे को साथ में सुलाती हैं और उन्हें अच्छे से ब्रेस्टफीडिंग कराती हैं, तो उन बच्चों में अचानक से होने वाले मृत्यु सिंड्रोम का खतरा नहीं रहता है। साथ ही माँ के लिए भी बच्चों के साथ सोना इस मायने में भी फायदेमंद है क्योंकि, इससे माँ अपने बच्चे को समय से ब्रेस्टफीडिंग करा सकती हैं। जिससे न केवल बच्चे का इम्युनिटी सिस्टम मजबूत होता है बल्कि, माँ में ब्रेस्टफीडिंग कराने से ब्रेस्ट कैंसर जैसी बिमारियों का खतरा भी कम रहता है।   

ऐसे में निचे को-स्लीपिंग के कुछ फायदे बताए जा रहें हैं, जिसे हर महिलाओं को ध्यान में रखना जरूरी है, जिनमें निम्न शामिल हैं-

शांतिपूर्वक नींद लेना

एक शोध में यह बात सामने आई है कि जो बच्चे अपने माँ के साथ सोते हैं वह बिना किसी भय के शांतिपूर्वक सोते हैं। वहीं इसके विपरीत जो बच्चे माँ से अलग सोते हैं वह रात में कई बार उठते और रोते हैं। ऐसे में, रात में कई बार चौंक कर उठने और एड्रेनालाईन की वजह से बच्चों में हृदय गति और रक्तचाप बढ़ने का खतरा रहता है। इतना ही नहीं, बच्चों में आरामदायक नींद के साथ हस्तक्षेप होने के कारण बाद में नींद से संबंधित बीमारियाँ भी हो सकती हैं।  

स्थिर फिजियोलॉजी

अध्ययनों से पता चलता है कि जो शिशु अपने पेरेंट्स के पास सोते हैं, उनका तापमान, और ह्रदय की लय सामान्य होती है। साथ ही, बच्चों में साँस से संबंधित बीमारी का खतरा भी कम रहता है।

शिशु मृत्यु सिंड्रोम का खतरा कम

अचानक शिशु मृत्यु सिंड्रोम (सडन इन्फेंट डेथ सिंड्रोम, एसआईडीएस) या कॉट डेथ कोई एक बीमारी या रोग नहीं है। बल्कि यह नाम उस स्थिति को दिया गया है, जब किसी बिल्कुल स्वस्थ शिशु की बिना किसी लक्षण के अप्रत्याशित रूप से मौत हो जाए। हालाँकि, कुछ डॉक्टरों का कहना है कि कुछ बच्चों के मस्तिष्क के उस हिस्से में समस्या होती है, जो हिस्सा सांस लेने और जागने की क्रिया को नियंत्रित करता है। इस वजह से वे शिशु सांस लेने में अवरोध उत्पन्न होने पर सामान्य तरीके से इस चुनौती का सामना नहीं कर पाते हैं जिस कारण यह खतरा उत्पन्न होता है।

लॉन्ग टर्म इमोशनल हेल्थ

को-स्लीपिंग बच्चे उच्च आत्मसम्मान, कम चिंता, बहुत कम उम्र में इंडिपेंडेंट और अच्छे व्यवहार के साथ बड़े होते हैं। साथ ही उनमें मनोरोग जैसी समस्या का खतरा भी कम होता है।

इसके अलावा, इस पर भी ध्यान देना चाहिए कि इसे कैसे प्रभावी तरीके से कारगर बनाया जाए-

  • बॉटल से दूध पीने वाले बच्चों को अपनी माँ से थोड़ा अलग सोना चाहिए, इसके लिए आप अपने बच्चे को बॉटल से दूध पिलाते समय एक अलग बेड का भी प्रयोग कर सकती हैं।
  • सबसे पहली बात यह है कि क्या आप अपने बच्चे के साथ बेड शेयर करने से खुश हैं, क्योंकि यदि आप अपने बच्चे को अपने पास सुलाना चाहते हैं तो जरूर सुलाएं।
  • इसके बाद जो सबसे ध्यान रखने युक्त बातें हैं वह यह है कि सबसे पहले यह सुनिश्चित करें कि आपने जो फिट डिस्पोजेबल डायपरअपने बच्चे को पहनाया है क्या वह प्रभावी है। क्योंकि, आपके बच्चे के लिए फिट डिस्पोजेबल डायपर की तुलना में कपड़े का डायपर अच्छा माना जाता है। क्योंकि, इससे न केवल बच्चे को अच्छी नींद आती है, बल्कि यह पर्यावरण के साथ-साथ बच्चे के स्वास्थ्य के लिए भी फायदेमंद है।
  • कुछ पेरेंट्स अपने बच्चे को उनके सिबलिंग्स के साथ सुला देते हैं, जो उम्र में उनसे कुछ साल ही बड़े होते हैं। हालांकि, यह सही तरीका नहीं है, अगर आप अपने शिशु को उन बच्चों के साथ सुलाते हैं तो रात में उसके साथ जागने और उनका ध्यान रखने की भी जिम्मेदारी लें।
  • जब भी आप अपने बच्चे को फीड कराएं तो इस बात का ध्यान रखें की आपके बाल यदि लंबे हों तो वह शिशु के कंधे या मुंह के पास नहीं आनी चाहिए।
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